The Chhattisgarh Societies Registraion Act, 1973
Chhattisgarh · state statute
Open in Lexace · Ask the AI about this act छत्तीसगढ़ सोसायटी िजिस्रीकिि अधिननयम 1973 ( संशोधित
1998) एवं ननयम 1998 :-
छत्तीसगढ़ सोसायटी िजिस्रीकिि अधिननयम, 1973
(क्रमांक 44 सन् 1973)
(ददनांक 29 लसिम्बर 1973 को राज्यपाि की अनुमति प्राति हुई, अनुमति ''मध्यप्रदेर् राजपत्र''
(असाधारि) में ददनांक 11 अतटूबर, 1973 को प्रिम बार प्रकालर्ि की गई)
छिीसगढ़ में सादहजत्यक, र्ैक्षखिक, िैज्ञातनक, धालमाक, िैरािी एिं जनकपयािकारी ििा अन्य सोसयदटयों
के रजजस्रीकरि से संबंथधि विथध को समेककि ििा संर्ोथधि करने हेिु अथधतनयम
भारि गिराज्य सरकार के चौबीसिें िदागा में छिीसगढ़ विधान मण्डि दिारा तनम्नलिखिि रूप
से यह अथधतनयलमि हो -
अध्याय - 1
प्रािंलभक
1. संक्षक्षति नाम , विस्िार ििा प्रारंभ - (1) यह अथधतनयम छिीसगढ़ सोसायटी रजजस्रीकरि
अथधतनयम, 1973 कहा जा सकेगा।
(2) इसका विस्िार सम्पूिा छिीसगढ़ पर है।
(3) यह ऐसी िारीि को प्रिृि होगा जजसे राज्य सरकार, अथधसूचना दिारा इस संबंध में तनयि
करे।
2. सोसायदटयां जजनको अथधतनयम िागू होिा है - यह अथधतनयम उन सोसायदटयों को िागू होिा है
जो तनम्नलिखिि समस्ि प्रयोजनों के लिए या उनमें से ककसी भी प्रयोजन के लिये बनायी गयी हों
-
(एक) विज्ञान, लर्क्षा, सादहत्य या िलिि किाओं की अलभिृदथध के लिये,
(दो) उपयोगी ज्ञान के प्रसार के लिये,
(िीन) राजनैतिक लर्क्षा के प्रसार के लिये,
(चार) सदस्यों के साधारि उपयोग के लिये या जनिा के लिये िुिे रहने िािे पुस्िकाियों या िाचनाियों
के प्रतिस्िापन या अनुरक्षि के लिये,
(पांच) थचत्रकारी ििा अन्य किाकृतियों की िीथिकाओं की स्िापना ििा उनके अनुरक्षि के लिये,
(छः) िोक संद्गहाियों की स्िापना ििा उनके अनुरक्षि के लिये,
(साि)प्रकृति विज्ञान, यांबत्रक ििा दार्ातनक आविष्कारो, उपकरिों या पररकपपनाओं के संद्गहि के लिये,
(आठ) सामाजजक कपयाि के संप्रििान के लिये,
(नौ) धालमाक या िैरािी प्रयोजन , जजसके अंिगाि सैतनक अनािों के कपयाि , राजनैतिक पीड़ड़िों के
कपयाि और िैसे ही व्यजतियों के कपयाि और तनथधयों की स्िापना आिी है , के सम्प्रििान के
लिये,
(दस) व्यायाम - विधा की प्रोन्नति के लिए,
(ग्यारह) राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार दिारा प्रायोजजि विलभन्न स्कीमों की प्रोन्नति ििा उनका
कक्रयान्ियन,
(बारह) िाखिज्य, उदयोग ििा िादी की प्रोन्नति
3. पाररभाषाएं- इस अथधतनयम में, जब िक संदभा में अन्यिा अपेक्षक्षि न हो, -
(क) ''सोसायटी के र्ासी तनकाय'' से अलभप्रेि है गिनार , पररषद संचािक, सलमति न्यासी या अन्य
तनकाय, जो चाहे जजस नाम से पुकारा जािा हो, ििा जजसे सोसायटी के वितनयमों दिारा उसके
कामकाज का प्रबंध सौंपा गया हो,
(ि) ''सोसायटी के सदस्य'' से अलभप्रेि है िह व्यजति जजसे सोसायटी के वितनयमों के अनुसार सोसायटी
में प्रिेर् ददया गया हो , ििा जो सोसायटी का ित्समय सदस्य हो , और जजसने सोसायटी के
वितनयमों के अनुसार -
(एक) अलभदान का संदाय कर ददया गया हो,
(दो) सदस्यों की नामाििी या सूची में हस्िाक्षर कर ददये गयें हों और
(िीन) पदत्याग न ककया हो।
(ग) ''रजजस्रार'' से अलभप्रेि है धारा 4 की उपधारा ( 1) के अधीन तनयुति ककया गया सोसायटी का
रजजस्रार, और उसके अंिगाि उति धारा की उपधारा (2) के अधीन तनयुति ककये गये सोसायटी के
अपर रजजस्रार, संयुति रजजस्रार ििा सहायक रजजस्रार उस दर्ा में आिे हैं, जबकक िे रजजस्रार
की समस्ि र्जतियों का या उनमें से ककसी भी र्जति का प्रयोग कर रहे हों , या रजजस्रार के
समस्ि किाव्यो का या उनमें से ककसी भी किाव्य का पािन कर रहे हों,
(घ) ''सोसायटी के वितनयमों'' से अलभप्रेि है सोसायटी के रजजस्रीकृि वितनयम जो ित्समय प्रिृि हो,
(ङ) ''सोसायटी'' से अलभप्रेि है इस अथधतनयम के अधीन रजजस्रीकृि की गयी या रजजस्रीकृि समझी
गयी कोई सोसायटी,
(च) ''राज्य सहायिा प्राति सोसायटी'' से अलभप्रेि है, िह सोसायटी जो केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार
या ककसी कानूनी तनकाय से सहायिा, अनुदान या उधार प्राति करिी है या जजसने ररयायिी दरों पर
भूलम या भिन या दोनों ििा अन्य सुविधाऍ प्राति की हैं।
हटप्पिी (िािा 3)
राज्य से िाभ प्राति सोसायटी - याथचकाकिाा की प्रर्ासकीय तनकाय को अतिजष्ठि करना प्रस्िाविि
करिे हुए र्ासन दिारा धारा 33 के अंिगाि जारी नोदटस को इस आधार पर चुनौिी दी गई है कक नोदटस
विथध के अथधकार के बबना है , याथचकाकिाा सोसायटी र्ासन से िाभ प्राति सोसाइटी नहीं है - राज्य
र्ासन के दिारा यह किन ककया गया कक याथचकाकिाा सोसायटी ने राज्य सरकार से जमीन प्राति ककया
है इसलिए ''राज्य से िाभ प्राति सोसाइटी '' की पररभादगााा की पूतिा होिी है एिं पट टा वििेि की
प्रतिलिवप पेर् ककया है। अलभतनधााररि - याथचकाकिाा सोसाइटी ने राज्य र्ासन से ररयायिी दर से जमीन
प्राति ककया है इसलिये उसके कामकाज के प्रबंध को विथधक हस्िक्षे प से वितनयलमि ककये जाने के लिए
अथधतनयम की धारा 33 के अंिगाि बाध्य है। (बाि आश्रम वि.छ.ग. राज्य एिं अन्य 2006(1)
छ.ग.िॉ.ज. 468)
र्ासन सहायिा प्रदि सोसायटी को , सहायिा प्राति होना चादहये। केिि सहायिा की स्िीकृति
अपयााति है। (आदर्ा विदया मंददर वि. मध्यप्रदेर् राज्य, 1982 एम.पी.एि.जे. 762 = 1983 जे.एि.जे.
161)
याची राज्य से सहायिा प्रदि सोसायटी है। राज्य र्ासन सांस्कृतिक हाि के तनमाािािा 24,000/-
िगा फीट भूलम तनकाय धारा 33 के अधीन हटाया गया, यह न िो अिैधातनक है, न ही मनमानी। (पत्रकार
भिन सलमति वि. मध्यप्रदेर् र्ासन 2000(1) एम.पी.एि.जे. 239)
याची सोसायटी राज्य र्ासन से कोई सहायिा प्राति नहीं कर रहा है। सन् 1990-91 के िदागा में
उसे राज्य र्ासन से मात्र 50,000/- रूपये का सहायिा ददया गया िा , याची/सोसायटी की जस्िति को
देििे हुये िह राज्य सहायिा प्रदि सोसायटी नहीं है। छिरपुर होलमयोंपेथिक एिं बायोकेलमक एसोलसयेर्न
वि. मध्यप्रदेर् राज्य, 2001 (3) एम.पी.एि.जे. 405
(3-क. विघमान सोसायदटयों का बचाि - धारा 44 के अधीन तनरलसि अथधतनयम के अधीन
रजजस्रीकृि समझी जाने िािी कोई सोसायटी इस अथधतनयम के अधीन रजजस्रीकृि समझी जािेगी।)
हटप्पिी (िािा 3-क)
तनरलसि सोसायटीज रजजस्रीकरि अथधतनयम के संबंध में संदभा, नये अथधतनयम के लिये संदभा के
रूप में लिये जाने के योग्य हैं। तनरलसि अथधतनयम के अधीन रजजस्रीकरि नये अथधतनयम के अधीन
समझे जाने के योग्य है। ए.आई.आर. 1964 सन्या 173 (अनुमोददि) ए.आई.आर. 1962 बाम्बे 12
(विभेददि)। र्ंकर लसंग वि. संस्िा सोनाबाई श्राविकाश्रम िुरई, आई.एि.आर. 1980 एम.पी. 568= 1976
जे.एि.जे. 465
अध्याय - 2
सलमनतयों का पंिीयक तथा उनके अन्य अधिकािी
4. सोसायदटयों का रजजस्रार ििा उनके अन्य अथधकारी ( 1) राज्य सरकार अथधसूचना दिारा, ककसी
व्यजति को तनयुजति कर सकेगी, जो कक सोसायदटयों का रजजस्रार कहिायेगा , जो ऐसी र्जतियों का
प्रयोग करेगा, ििा ऐसे किाव्यो एिं कृत्यों का पािन करेगा, जो कक इस अथधतनयम के उपबन्धों दिारा
या उनके अधीन प्रदि की गयी है , और ऐसे साधारि या विर्ेष आदेर् के, जो कक राज्य सरकार दिारा
बनाए जाएं, के अध्यधीन रहिे हुए, प्रर्ासन का अधीक्षि करेगा और सम्पूिा राज्य में इस अथधतनयम के
उपबंधों को कायााजन्िि करेगा।
(2) राज्य सरकार िैसे ही अथधसूचना दिारा, ऐसे क्षेत्रों के लिए, जो कक अथधसूचना में वितनददाष्त्गि
ककये जायें और व्यजति भी तनयुति कर सकेगी, जो सोसायटी के अपर रजजस्रार, संयुति रजजस्रार, उप
रजजस्रार ििा सहायक रजजस्रार कहिायेंगे और उन्हें इस अथधतनयम के समस्ि उपबन्धों या उसमें से
ककसी भी उपबंध के अधीन ऐसी र्जतियों का प्रयोग करने ििा ऐसे किाव्यो का पािन करने के लिये जो
कक अथधसूचना में वितनददाष्त्गि की जाये। ककए जाएं, सर्ति कर सकेगी।
हटप्पिी (िािा 4)
अथधतनयम का उदयेर्, अथधतनयम के अध्याय साि के उदयेर् के अनुसार पंजीयक के केिि र्ैक्षक्षक
अथधकारी आयोजजि होगा। श्रमधाम उच्चिर माध्यलमक विदयािय संचािन सलमति एिं अन्य
वि.मध्यप्रदेर् राज्य एिं अन्य 2003 (2) एम.पी.एि.जे.
अध्याय-3
िजिस्रीकिि
5. सोसायदटयों प्रतिष्ठान - ज्ञापन ििा रजजस्रीकरि दिारा बनेगी - कोई भी साि या साि से अथधक
व्यजति, जो ककसी सादहजत्यक, िैज्ञातनक, र्ैक्षखिक, धालमाक या िैरािी प्रयोजन के लिए या ककसी भी ऐसे
प्रयोजन के लिये जो कक धारा 2 में िखिाि हैं, सहयुति हुए हों, प्रतिष्ठान ज्ञापन में अपने हस्िाक्षर करके
और उसे रजजस्रार के पास फाईि करके इस अथधतनयम के अधीन स्ियं की एक सोसायटी बना सक ें गे।
6. प्रतिष्ठान - ज्ञापन के संबंध में अपेक्षाऍ - (1) प्रत्येक सोसायटी के प्रतिष्ठान ज्ञापन में
तनम्नलिखिि बािें कथिि की जायेगी -
(क) सोसायटी का नाम
(ि) सोसायटी का उददेश्य
(ग) सोसायटी के प्रधान कायाािय का स्िान
(घ) गिर्ानरो, पररषद, संचािकों, सलमति या अन्य र्ासी तनकाय, जजसे सोसायटी के वितनयमों दिारा
सोसायटी के कामकाज का प्रबंध सौपा गया हो, के नाम, पिे ििा उनकी उपजीविकाऍ।
(2) प्रतिष्ठान ज्ञापन में कोई भी ऐसा नाम प्रस्िावपि नहीं ककया जायेगा -
(क) जो उस नाम के, जजसके कक कोई विदयमान सोसायटी राज्य में कहीं भी ित्पूिा रजजस्रीकृि की
गयी हो, समान हो या अत्यथधक सदर् हो, या
(ि) जो -
(एक) ऐसे र्ब्द से बनिा हो जो भारि सरकार का या ककसी राज्य की सरकार का प्रतिष्ठान
व्यंजजि करिे हो या व्यंजजि करने के लिए प्रकजपपि हो, या
(दो) राष्रीय, अंिराष्रीय या विश्व्यापी महत्ि के ऐसे र्ब्दो से या ऐसे अन्य र्ब्दो से बनिा
हो जजन्हें कक राज्य सरकार, समय-समय पर अथधसूचना दिारा वितनदेर्ि करें, या
(िीन) ऐसे र्ब्दो से बनिा हो, जजनसे कक रजजस्रार की राय में जनिा को भ्रम होना संभाव्य
हो।
(3) सोसायटी के वितनयमों की एक प्रतिलिवप, जजसे र्ाषी तनकाय के सदस्यों में से कम से कम िीन
सदस्यों दिारा सही प्रतिलिवप प्रमाखिि ककया गया हो, प्रतिष्ठान ज्ञापन के साि फाईि की जायेगी।
(4) िे व्यजति जजनके दिारा या जजनकी ओर से ऐसा ज्ञापन प्रस्िुि ककया जाये, सोसायटी के बारे में
ऐसी और जानकारी देंगे, जैसी कक रजजस्रार अपेक्षक्षि करें।
हटप्पिी (िािा 6)
'छिीसगढ र्ीषक कांद्गेस' दिारा छ.ग. उच्च न्यायािय में िाद प्रस्िुि कर पंजीयक फमा एिं
सोसायटी दिारा ददनांक 6-2-2001 को ''छिीसगढ़ प्रदेर् र्ीषक कांद्गेस'' के पंजीयन एिं अपीि प्राथधकारी
दिारा ददनांक 10-4-2002 को इस संबंध में अपीि तनरस्ि करने के आदेर्ो पर प्रर्न थचन्ह िगाया। िाद
स्िीकार करिे हुए अपीि प्राथधकारी का आदेर् ददनांक 10-4-2002 ििा ''छिीसगढ़ प्रदेर् र्ीषक कांद्गेस''
का पंजीयन तनरस्ि ककया गया। छिीसगढ़ र्ीषक कांद्गेस वि. छ.ग. राज्य एिं अन्य ररट वपटीर्न नं.
1177 सन् 2002 आदेर् पाररि ददनांक 27-4-2011
पुनरािेदक के अपने सोसायटी का नामकरि ककया/रिा जजससे प्रेस काउंलसि ऑफ इंड़डया के साि
भ्रम उत्पन्न कर रहा है। पंजीयक फम्सा एिं सोसायटी ने संर्ोधनािा तनदेर् प्रदि ककया सही है। 2002(1)
एम.पी.नो. 206 इंड़डयन प्रेस काउजन्सि वि. मध्यप्रदेर् राज्य सरकार
7. रजजस्रीकरि - यदद रजजस्रार का यह समाधान हो जाये कक सोसायटी ने इस अथधतनयम के ििा
उसके अधीन बनाये गये तनयमों के उपबंधों का अनुपािन कर ददया है और यह कक उसके प्रस्िावपि
वितनयम उति उपबन्धों के प्रतिकूि नहीं है, िो िह ऐसी फीस का संदाय करने पर जो कक विदहि की
जाये, सोसायटी और उसके वितनयमों को रजजस्रीकृि करेगा और रजजस्रीकरि का प्रमाि पत्र जारी
करेगा।
हटप्पिी (िािा 7)
छिीसगढ़ िोक न्यास अथधतनयम , 1951 एक विर्ेष अथधतनयम है, जो कक 1973 के अथधतनयम
पर अलभभािी होिा है। न्यास, सोसायटी के रूप में अथधतनयम की धारा 7 के अधीन पंजीकृि हो, िो भी
िह 1951 के अथधतनयम के अधीन पंजीकृि ककये जाने योग्य है। मुकुट लसंग लसकरिार वि. मूतिा श्री
दिाररकाधीर् जी महाराज, 1992(2) विथध भास्िर 215 = 1992 एम.पी.एि.जे. 273
8. रजजस्रीकरि का साक्ष्य - रजजस्रार दिारा हस्िाक्षररि रजजस्रीकरि प्रमाि पत्र , जब िक कक यह
साबबि न कर ददया जाये कक सोसायटी का रजजस्रीकरि रद द कर ददया गया है, इस बाि का तनर्चायक
साक्ष्य होगा, कक उसमें िखिाि सोसायटी सम्यक् रूप से रजजस्टी्कृि है।
9. सोसायटी के वितनयम - सोसायटी के वितनयमों में तनम्नलिखिि के लिये उपबन्ध हो सकेगा -
(एक) सदस्यों को प्रिेर् देने की र्िे,
(दो) कतिपय पररजस्ितियों में जुमााने ििा समपहरि के प्रति सदस्यों का दातयत्ि
(िीन) ककसी अलभदान या जुमााने का संदाय न करने के पररिाम, सदस्यों के त्यागपत्र और तनदगकासन,
(चार) न्यालसयों की तनयुजति, उनका हटाया जाना और उनकी र्जतियााँ
(पांच) र्ासी तनकाय को तनयुति करने ििा उसे हटाने की रीति और ऐसे तनकाय की र्जतियााँ,
(छः) सोसायटी के िावषाक सम्मेिन ििा अन्य सम्मेिनों का समय और स्िान,
(साि) िह रीति, जजसमें ऐसे सम्मेिनों की सूचना दी जा सकेगी,
(आठ) सोसायटी के सम्मेिनों में काम-काज करने के लिये अियश्यक गिपूतिा,
(नौ) वितनयम बनाने, उन्हें पररितिाि और वििंड़डि करने की रीति,
(दस) तनथधयों का वितनधान , िेिाओं का रिा जाना और िेिाओं की िावषाक या तनयि कालिक
संपरीक्षा,
(ग्यारह) सोसायटी को विघदटि करने की रीति,
(बारह) विघटन के पश्चाि् इस बाि का अिधारि कक सम्पवि का उपयोग सरकार दिारा धारा 36 के
अनुसार ककया जायेगा।
(िेरह) उपविथधयों दिारा उपबंथधि ककये जाने िािे विदगाय ििा िह रीति , जजसमें िह बनायी जायेगी ,
और
(चौदह) ऐसे अन्य विषय, जो सोसायटी के स्िरूप और उदयेर् को ध्यान में रििे हुए समीचीन समझे
जाऍ।
हटप्पिी (िािा 9)
सोसायटी के उपविथधयों के अनुसार सदस्य होने की रीति, प्रर्ाषक अन्य रीति का अनुसरि नहीं
कर सकिा है। कुसुम बाई जैन वि. मध्यप्रदेर् राज्य, 1998 (2) जे.एि.जे. 397
सदस्य के दिारा र्ुपक भुगिान नहीं, उपविथधयों में कोई उपबंध नहीं , कक समाजति स्ियंमेि होिी
है। समाजति उपविथधयों के अनुसार की जा सकिी है। कुसुम बाई जैन वि. मध्यप्रदेर् राज्य, 1998 (2)
जे.एि.जे. 397
10. रजजस्रीकृि सोसायटी के ज्ञापन ि वितनयमों या उपविथधयों के संर्ोधन - (1) रजजस्रीकृि सोसायटी
के प्रतिष्ठान - ज्ञापन या वितनयमों का कोई भी संर्ोधन िब िक विथधमान्य नहीं होगा जब िक कक िह
संर्ोधन इस अथधतनयम के अधीन रजजस्रीकृि न कर लिया गया हो।
(2) ऐसे संर्ोधन के लिये प्रत्येक प्रस्िापना ऐसे प्ररूप में ििा ऐसी फीस के साि , जैसी कक विदहि
की जाए, रजजस्रार को अद्गेवषि की जाएगी और यदद रजजस्रार को यह समाधान हो जाए कक संर्ोधन इस
अथधतनयम या उसके अधीन बनाये गये तनयमों के प्रति कूि नहीं हैं, िो िह यदद उथचि समझे , संर्ोधन
को रजजस्रीकृि कर सकेगा।
(3) जहॉ कोई संर्ोधन उपधारा (2) के अधीन रजजस्रीकृि ककया गया हो, िहॉ रजजस्रार धारा 29
में वितनददावषि की गयी फीस का संदाय करने पर संर्ोधन की एक प्रतिलिवप जो कक उसके दिारा
प्रमाखिि की जायेगी , सोसायटी को देगा , जो इस बाि का तनर्चायक साक्ष्य होगा कक िह ( संर्ोधन)
सम्यक् - रूपेि रजजस्रीकृि है।
11. सोसायटी के ज्ञापन या वितनयमों आदद को संर्ोथधि करने की रजजस्रार की द्राजति - (1) इस
अथधतनयम या उसके अधीन बनाये गये तनयमों में अन्िविादगट ककसी बाि के होिे हुए भी यदद रजजस्रार
यह समझे कक ककसी सोसायटी के प्रतिष्ठान-ज्ञापन या वितनयम या उपविथधयों में कोई संर्ोधन ककया
जाना उस सोसायटी के दहि में आियर्क या िांछनीय है, िो िह लिखिि आदेर् दिारा, जजसकी िामीि
उस सोसायटी पर विदहि रीति में की गजायेगी , उस सोसायटी से यह अपेक्षा कर सकेगा कक िह ऐसे
समय के भीिर , जो कक ऐसे आदेर् में वितनददावषि ककया जाये, िह उस संर्ोधन को करे।
(2) यदद िह सोसायटी उस समय के भीिर जो कक रजजस्रार दिारा उपधारा ( 1) के अधीन अपने
आदेर् में वितनददादगट ककया गया हो, कोई ऐसा संर्ोधन करने से चूक जाये, िो रजजस्रार उस
सोसायटी को उसकी आपवियां, यदद कोई हों, कथिि करने का अिसर देने के पश्चाि -
(क) प्रतिष्ठान - ज्ञापन या वितनयमों के ऐसे संर्ोधन को रजजस्रार में दजा करेगा और उसकी एक
प्रमाखिि प्रतिलिवप उस सोसायटी को भेजेगा, या
(ि) उपविथधयों में ऐसा संर्ोधन करेगा और उसकी एक प्रमाखिि प्रतिलिवप उस सोसायटी भेजेगा ,
और िदुपरर प्रतिष्ठान ज्ञापन या वितनयमों या उपविथधयों का ऐसा संर्ोधन उस सोसायटी ििा उसके
सदस्यों को आबदधकर होगा।
12. सोसायटी के नाम की िब्दीिी - कोई भी रजजस्रीकृि सोसायटी धारा 14 के उपबन्धों के अध्याधीन
रहिे हुए, अपने नाम की िब्दीिी, इस प्रयोजन के लिये बुिाये गये साधारि सजम्मिन में अपने सदस्यों
की कुि संिया के कम से कम दो तिहाई सदस्यों की सम्मति से पाररि संकपप दिारा कर सकेगी।
13. नाम िब्दीिी की सूचना - (1) धारा 12 के अधीन पाररि ककये गये संकपप की एक प्रतिलिवप
रजजस्रार को भेजी जायेगी।
(2) यदद रजजस्रार का यह समाधान हो जाये कक नाम की िब्दीिी के बारे में इस अथधतनयम के
उपबन्धों का अनुपािन हो गया ििा यह समाधान हो जाये कक प्रस्िावपि नाम धारा 6 की उपधारा (2)
के उपबन्धों के अनुरूप है िो िह पूिाििी नाम के स्िान पर रजजस्रार में नया नाम दजा करेगा, ििा दजा
ककया जाने का प्रमाि पत्र उसमें आियर्क पररििान सजन्नविदगट करके जारी करेगा , ििा नाम की
िब्दीिी ऐसा प्रमाि पत्र जारी होने पर ही पूिा एिं प्रभािी होगी।
(3) रजजस्रार सोसायटी के प्रतिष्ठान - ज्ञापन में भी आियर्क पररििान करेगा।
(4) रजजस्रार, उपधारा (2) के अधीन जारी ककये गये प्रमाि पत्र की ककसी भी प्रतिलिवप के लिये
एक रूपया फीस िेगा, और इस प्रकार संदि समस्ि फीस का राज्य सरकार को िेिा ददया जायेगा।
14. नाम िब्दीिी का प्रभाि - सोसायटी के नाम में िब्दीिी का उन सदस्यों , जजनको कक िब्दीिी
के पूिा में ददया गया हो, या सोसायटी के ककन्हीं भी अथधकारों या उनकी बाध्यिाओं पर कोई प्रभाि न हीं
पड़ेगा, या न िह िब्दीिी सोसायटी दिारा की गयी या सोसायटी के विरूदध की गयी ककसी विथधक
कायािाही को त्रुदटपूिा बनायेगी।
15. सोसायदटयां अपने प्रयोजनों को पररिबत्रि करने या न्यून करने के लिये समिा बनायी जायेंगी - जब
कभी ककसी ऐसी रजजस्रीकृि सोसायटी के, जो ककस विजश्ष्ठ प्रयोजनों का प्रयोजन के लिये स्िावपि की
गयी हो, र्ासी तनकाय को यह प्रिीि हो, कक ऐसे प्रयोजन की, इस अथधतनयम के अिा के अंिगाि अन्य
प्रयोजनों के संबंध में या प्रयोजनों के लिये पररितिाि करना , विस्िाररि करना या न्यून करना या ऐसी
सोसायटी को ककसी अन्य सोसायटी के साि पूिािः या भागिः समामेलिि करना उथचि है, ऐसा र्ासी
तनकाय उस प्रतिपादन का सोसायटी के सदस्यों के समक्ष लिखिि या मुदद्रि ररपोटा के रूप में प्रस्िुि कर
सकेगा और सोसायटी के वितनयमों के अनुसार उस पर विचार करने के लिये एक विर्ेष सजम्मिन बुिा
सकेगा :
परन्िु कोई भी ऐसी प्रतिपादना िब िक कायााजन्िि नहीं की जायेगी, जब िक कक ऐसी ररपोटा र्ासी
-तनकाय दिारा उस पर विचार करने के लिये बुिाये गये विर्ेष सजम्मिन के दस ददन पूिा, सोसायटी के
प्रत्येक सदस्य को पररदि न कर दी गयी हो या डाक से भेज न दी गयी हो और जब िक कक ऐसी
प्रतिपादन को सदस्यों के िीन पंचमार् मिों दिारा जो कक स्ियं ददये गये हों या परोक्ष दिारा ददये गये
हों, सहमति प्राति न हो गई हो ििा र्ासी -तनकाय दिारा पूिा सजम्मिन के पश्चाि् एक मास के अंिराि
से बुिाये गये दवििीय विर्ेष सजम्मिन में उपजस्िि सदस्य के िीन पंचमार् मिों दिारा उसकी पुजष्ट न
कर दी गयी हो।
अध्याय - 4
सदस्य, उनके अधिकाि तथा ववशेषाधिकाि
16. सदस्य का रजजस्टर - (1) प्रतिष्ठान - ज्ञापन के हस्िाक्षरकिाा सोसायटी के प्रिम सदस्य होंगे।
(2) प्रत्येक सोसायटी अपने सदस्यों का एक रजजस्टर अपने प्रधान कायाािय में बनाये रिेगी और
उसमें तनम्नलिखिि विलर्जष्टयााँ दजा करेगी, अिााि् :-
(क) प्रत्येक सदस्य का नाम, पिा ििा िारीि सदहि हस्िाक्षर
(ि) िह िारीि जजसको कक सदस्यों को प्रिेर् ददया गया हो,
(ग) िह िारीि जजसको कक सदस्य न रहे हों।
(3) सदस्यों का रजजस्टर सोसायटी की सदस्यिा का ििा उसमें दजा की गई समस्ि बािों का प्रिम
दष्टया साक्ष्य होगा:
परन्िु ऐसा कोई भी सदस्य जजसका अलभदान, ित्समय, छः मास से अथधक कािािथध से
बकाया हो, इस अथधतनयम के अधीन सोसायटी की ककन्हीं भी कायािादहयों में मि देने का हकदार नहीं
होगा।
(4) यदद ककसी सदस्य के प्रिेर् या सदस्यिा की समाजति के 30 ददन के भीिर सदस्यों के
रजजस्टर में प्रविजष्ठया न की जाये िो व्यतिक्रम करने िािा प्रत्येक पदाथधकारी जुमााने से, जो सौ रूपये
िक हो सकेगा, दण्डनीय होगा।
17. सदस्यों पर व्यजतियों की भांति िाद चिाये जाने के दायी होंगे - (1) रजजस्रीकृि सोसायटी के
ककसी भी ऐसे सदस्य के विरूदध , जजस पर कोई अलभदान , जजसका कक संदाय करने के लिये िह
सोसायटी के वितनयमों के अनुसार आबदध हो, बकाया हो या जो सोसायटी की कोई सम्पवि, ऐसी रीति में
या ऐसे समय के लिये ,, जो ऐसे वितनयमों के प्रतिकूि हो, अपने कब्जे में रिेगा या तनरूदध करेगा या
सोसायटी की ककसी सम्पवि को क्षति पहुंचायेगा या उसे नष्ट करेगा, ऐसे बकाया के लिये या सम्पति के
ऐसे तनरोध , क्षति या विनार् से प्रोद भूि होने िािी नुकसानी के लिये इस अथधतनयम के उपबन्ध
केअनुसार िाद चिाया जा सकेगा।
(2) यदद प्रतििादी ककसी ऐसे िाद या अन्य कायािाही में जो कक सोसायटी की प्रेरिा पर उसके
विरूदध प्रस्िुि की गई हो, ककया गया हो, सफि हो जाये और अपना िचा ि सूि करने के लिये न्याय
तनखिाि ककया जाये, िो िह इस बाि का चुनाि कर सकेगा कक उस िचा की उस अथधकारी से, जजसके
कक नाम से िाद चिाया जायेगा या सोसायटी से , िसूि करने की कायािाही करे, और पश्चाि् कथिि
मामिे में उति सोसायटी की सम्पवि के विरूदध इस अथधतनयम के उपबन्ध के अनुसार कायािाही करेगा।
18. अपराधों के दोषी सदस्य व्यजतियों की भांति दंडनीय होंगे - सोसायटी का कोई भी सदस्य, जो ऐसी
सोसायटी का कोई धन या अन्य सम्पतिि चुरायेगा, हड़पेगा या गबन करेगा या जानबूझकर ििा
विदेश्िािर् ऐसी सोसायटी की सम्पवि को नदगट करेगा या क्षति पहुंचायेगा या ककसी वििेि, बंधपत्र धन
की प्राजति के लिये प्रतिभूति या अन्य लिखिि को कूटरथचि करेगा, जजससे कक सोसायटी की तनथधयों को
हातन पहुंचने की आर्ंका हो, उसी प्रकार के अलभयोजन के अधीन होगा और यदद लसदध दोदगा ठहराया
जाये, िो िैसी ही रीति से दजण्डि ककये जाने का भागी होगा, जजस प्रकार की सदस्य से लभन्न कोई अन्य
व्यजति उसी प्रकार के अपराध के संबंध में अलभयोजन के अधीन होिा ििा दजण्डि ककये जाने का भागी
होिा।
19. उपविथध के अधीन प्रोदभूि होने िािी रालर् की िसूिी - जब कभी सोसायटी के वितनयमों के
अनुसार सम्यक् रूप से बनाई गई ककसी उपविथध दिारा सोसायटी के ककन्हीं वितनयमों या ककसी उपविथध
के भंग के लिये कोई धन संबंधी र्ालसि अथधरोवपि की जाये, िो ऐसी र्ालसि, प्रोद भूि होने पर, उस
स्िान पर, जहॉ कक प्रतििादी तनिास करिा हो या जहॉ कक सोसायटी जस्िि हो, जजसे भी उसका र्ासी
तनकाय समीचीन समझे, अथधकाररिा रिने िािे ककसी भी न्यायािय में िसूि की जा सकेगी।
अध्याय - 5
सोसायहटयों की सर्मपवत्त तथा ननधियॉ
20. सोसायदटयों की सम्पवि ककस प्रकार तनदहि होगी - इस अथधतनयम के अधीन रजजस्रीकृि की गयी
ककसी सोसायटी की जंगम ििा स्िािर सम्पवि यदद िह न्यालसयों में तनदहि न हुई हो िो ित्समय ऐसी
सोसायटी के र्ासी -तनकाय में तनदहि हुई समझी जायेगी और समस्ि लसविि ििा दाजण्डक कायािादहयों
में उथचि नाम से सोसायटी के र्ासी -तनकाय की सम्पवि के रूप में िखिाि की जायेगी।
21. (1) सोसायटी स्िािर सम्पवि का अजान, विक्रय या अंिरि रजजस्रार की पूिा अनुज्ञा के बबना नहीं
करेगी - सोसायटी दिारा कोई भी स्िािर सम्पवि रजजस्रार की लिखिि पूिा अनुज्ञा के बबना, विक्रय
दिारा, दान दिारा या अन्यिा अजजाि या अन्िररि नहीं की जायेगी।
(2) अजजाि या अंिररि की गई सम्पवि का उपयोग , सोसायटी के उध्येर्ो से लभन्न ककसी उददेश्य
के लिये िब िक नहीं ककया जाएगा जब िक कक रजजस्रार से अनुज्ञा अलभप्राति न कर िी गई हो ििा
दान की दर्ा में दािा की लिखिि सहमति भी अलभप्राति न कर िी गई हो।
(3) उपधारा (1) ििा (2) के अधीन अनुज्ञा के लिए आिेदन ऐसे प्रारूप में ऐसे दस्िािेजों सदहि
ििा ऐसी फीस के साि, जैसी कक विदहि की जाए, ककया जाएगा।
(4) जहॉ कोई सोसायटी उपधारा (1) या (2) के उपबंधों का उपिंघन करिी है िहॉ सोसायटी ऐसी
रकम जैसी कक विदहि की जाए, रजजस्रार दिारा जारी ककए गए नोदटस की िारीि से िीन मास के भीिर
जमा करने के लिए दायी होगी और यदद सोसायटी ऐसी रकम पूिोति समय के भीिर जमा करने में
असफि रहिी है िो सोसायटी को धारा 34 के अधीन तनजष्क्रय समझा जाएगा।
शासनादेश
धारा 21 के संबंध में विथध विभाग से पंजीयक , फमा एिं संस्िाऍ , रायपुर को प्रदि अलभमि
तनम्नानुसार है :-
उपर िखिाि धारा 21 की उपधारा (1) में र्ब्द 'अन्यिा' का अिाान्ियन संकुथचि रूप में न ककया
जाकर िृहद रूप दिारा सम्पवि के अजान भी होगा और ऐसी जस्िति में धारा 21 के प्रािधान आकवषाि
होंगे।
धारा 21 की उपधारा (2) के प्रािधान अपने आप में स्पष्ट है कक रजजस्रार के अनुज्ञा अलभप्राति
ककये बबना उपरोतिानुसार ककसी भी रूप में अजजाि सम्पवि का उपयोग, सोसायटी के उदयेर् से लभन्न
ककसी उददेश्य के लिये नहीं ककया जाएगा और यह प्रािधान आज्ञापक है।
अिः प्रर्ाश्कीय विभाग अथधतनयम की धारा 21 के प्रािधानों ि उसके प्रकार् में स्पष्ट की गई जस्िति के
अनुरूप अपने स्िवििेक का प्रयोग करिे हुए प्रकरि में अथद्गम कायािाही कर सकिा है।
(मान. प्रमुि सथचि विथध दिारा अनुमोददि)
सही/-
(के.एि. चरयािी)
अति. सथचि (विथध) दद. 6-1-2010
22. सोसायटी दिारा ििा उसके विरूदध िाद - प्रत्येक सोसायटी उसके अध्यक्ष या सभापति या प्रधान
सथचि या न्यालसयों के नाम से , जैसा कक सोसायटी के वितनयमों दिारा अिधाररि ककया जाये और इस
प्रकार अिधाररि न ककये जाने की दर्ा में उस व्यजति के जो कक र्ासी तनकाय दिारा इस तन लमि
तनयुति ककया जाये, नाम से िाद चिा सकेगी या उसी नाम के विरूदध िाद चिाया जा सकेगा:
तनदालर्ि न ककया जाये िो सोसायटी के विरूदध दािा या मांग करने िािा कोई भी व्यजति इस
बाि के लिये सक्षम होगा कक िह उसके अध्यक्ष या सभापति या प्रधान सथचि या न्यालसयों के विरूदध
िाद चिाये।
23. िाद का उपर्मन नहीं होगा - ककसी लसविि न्यायािय के ककसी भी िाद का उपर्मन इस कारि
नहीं होगा, या उसमें की कोई भी कायािाही इस कारि बंद नहीं होगी , कक उस व्यजति की, जजसके दिारा
या जजसके विरूदध ऐसा िाद चिाया गया हो या ऐसी कायािाही की गयी हो, मृत्यु हो गयी हो या िह उस
हैलसयि में, जजस नाम से कक िह व्यजति िाद चिािा , या जजस नाम से कक उस व्यजति के विरूदध
िाद चिाया जािा, नहीं रहा गया है, ककन्िु िहीं िाद/कायािाही ऐसे व्यजति के उिराथधकारी के नाम से या
उस व्यजति के उिराथधकारी के विरूदध चािू रिा जायेगा/रिी जायेगी।
24. सोसायटी के विरूदध तनिाय का प्रििान - (1) यदद सोसायटी की ओर से नालमि व्यजति या
अथधकारी के विरूदध कोई तनिाय हो जाये , िो ऐसा तनिाय ऐसे व्यजति या अथधकारी की जंगम या
स्िािर सम्पवि के विरूदध या उसके द्रारीर के विरूदध प्रितिाि नहीं ककया जायेगा अवपिु उसे सोसायटी
की सम्पवि के विरूदध प्रितिाि ककया जायेगा।
(2) तनदगपादन संबंधी आिेदन में तनिाय उपिखिाि ककया जायेगा , यह िथ्य उपिखिाि ककया
जायेगा कक उस पक्षकार ने जजसके विरूदध तनिाय हुआ है सोसायटी की ही ओर से िाद चिाया है या उस
िति पक्षकार के विरूदध सोसायटी के ही तनलमि िाद चिाया गया है , जैसी भी दर्ा हो और उसमें
(आिेदन में) यह अपेक्षा की जायेगी कक तनिाय सोसायटी की सम्पवि के विरूदध प्रितिाि ककया जाये।
25. सोसायटी दिारा िेिा पुस्िकों का रिा जाना - (1) प्रत्येक सोसायटी अपने प्रधान कायाािय पर
तनम्नलिखिि के संबंध में उथचि िेिा रिेगी:-
(क) सोसायटी दिारा प्राति की गयी ििा व्यय की गई समस्ि धनरार्ी और िे बािें जजनके बाबि्
धन रालर् प्राति होिी हो ििा उनका व्यय होिा हो और
(ि) सोसायटी की आजस्ियां ििा दातयत्ि।
(2) िेिा पुस्िकें , सोसायटी के कायाािय समय के दौरान , सोसायटी के पदाथधकारी या सदस्यों के
या रजजस्रार के तनरीक्षि के लिये िुिी रहेंगी।
(3) उपधारा (1) के प्रयोजन के लिये, उथचि िेिा पुस्िकें उनमें वितनददाष्ट की गयी बािों के संबंध
में रिी गयी नहीं समझी जायेंगी यदद िे सोसायटी के कायाकिापों की जस्िति का सही ििा साफ थचत्र
प्रस्िुि न करिी हो और उसके संव्यिहारों को स्पष्ट न करिी हो।
26. अलभिेिों आदद का अथधद्गहि करने की रजजस्रार की द्राजति - (1) जहॉ कक रजजस्रा र का यह
समाधान हो जाये कक -
(क) ककसी सोसायटी के अलभिेि, रजजस्रार या िेिा पुस्िकों का बबगाड़ा जाना या नष्ट ककया जाना
संभाव्य है ििा ककसी सोसायटी की तनथधयों एिं सम्पवि या दुविातनयोजन या दुरूपयोजन ककया जाना
संभाव्य है, या
(ि) यदद ककसी सोसायटी के र्ासी -तनकाय या सोसायटी के साधारि सम्मेिन में पुनगाठन हुआ हो
और उस र्ासी -तनकाय के बदहगाामी सदस्यों ने सोसायटी के अलभिेिों ििा सम्पवि का भार उन
व्यजतियों को, जजन्हें कक ऐसा भार प्राति होना या जो ऐसा भार प्राति करने के हकदार हो , सौंपने से
इंकार कर ददया है, िहॉ रजजस्रार अपने दिारा लिखिि में सम्यक् रूपेि प्राथधकृि ककये गये ककसी व्यजति
को यह तनदेलर्ि करिे हुए आदेर् जारी कर सकेगा कक िह उस सोसायटी की ऐसी पुस्िकों ििा
अलभिेिों, तनथधयों एिं सम्पवि का अथधद्गहि कर िे , ििा उनका कब्जा िे िे और सोसायटी के िे
अथधकारी जजन पर ऐसी पुस्िकों, अलभिेिों, तनथधयों ििा सम्पवि की अलभरक्षा का उिरदातयत्ि हो , इस
प्रकार प्राथधकृि ककये गये व्यजति को उनका पररदान करेंगे।
(2) उपधारा (1) के अधीन आदेर् का अनुपािन सुतनलर्ि करने के लिये रजजस्रार ऐसी कायािाही
कर सकेगा या करिा स केगा ििा ऐसे न्यूनिम बि का जजसमें पुलिस बि सजम्मलिि है, प्रयोग कर
सकेगा या करिा सकेगा, जो कक आिश्यक समझा/समझी जाये।
अध्याय - 6
वावषाक ववविणियॉ, संपिीक्षा, ननिीक्षि तथा पयावेक्षि
27. र्ासी तनकाय की िावषाक सूची फाईि की जायेगी - प्रत्येक िषा में एक बार, उस ददन के, जजसको
कक सोसायटी के वितनयमों के अनुसार सोसायटी का िावषाक साधारि सजम्मिन ककया गया हो , पश्चाि्
आने िािे पैंिािीसिे ददन या उसके पूिा या जब सोसायटी के वितनयम में िावषाक साधारि सजम्मिन
करने का उपबंध न हो िो 31 जनिरी से पैंिािीस ददन के भीिर, सोसायटी के अध्यक्ष या सथचि दिारा
ऐसे प्ररूप में ऐसे दस्िािेजों सदहि ििा ऐसी फीस के साि जो कक विदहि की जाए , र्ाषी तनकाय के पूरे
नामों, स्िायी पिे ििा मुिय उपजीविकाओं एिं अन्य बािों, यदद कोई हों, की एक सूची हस्िाक्षरों सदहि
रजजस्रार के पास फाईि की जाएगीः
परन्िु रजजस्रार , िेिबदध ककये जाने िािे कारिों से , अनुपािन के लिए पन्द्रह ददन से अनथधक
और समय दे सकेगा,
परन्िु यह ओर भी कक यदद सोसायटी विदहि समय-सीमा के भीिर या बढ़ाए गए समय के भीिर ,
सूची फाईि करने भीिर सूची ऐसी वििम्ब फीस के साि, जैसी कक विदहि की जाए, फाईि कर सकेगी।
28. संपरीक्षा ििा तनरीक्षि - (1) प्रत्येक सोसायटी, सोसायटी के िावषाक साधारि सजम्मिन की िारीि
से या जहां वितनयम में ककसी िावषाक साधारि सजम्मिन के लिए उपबंध नहीं है िहॉ प्रत्येक िषा अप्रेि
माह की 30 िारीि से नब्बे ददन के भीिर संपरीक्षकों दिारा सम्यक् रूपेि संपरीक्षक्षि पूिा विलर्जष्ठयों
सदहि आय ििा व्यय का वििरि, पूिाििी िषा की संपरीक्षा ररपोटा ििा िुिना-पत्र (बैिेन्स र्ीट) समस्ि
वििीय कक्रयाकिापों के साि ििा ऐसी फीस सदहि जैसी कक विदह ि की जाए, रजजस्रार को भेजेगी। यदद
सोसायटी उपयुाति वििरि तनयि समय के भीिर भेजने में असफि रहिी है िो सोसायटी ऐसी वििम्ब
फीस संदि करने की दायी होगी जैसी कक विदहि की जाए। रजजस्रार , ऐसे वििरि के प्राति होने पर ,
वििरि का सत्यापन करेगा और यह सुतनलर्ि करेगा कक तनथधयों का उपयोग सोसायटी और उददेश्य की
अलभिृदथध के लिये ककया गया है और ि तनथधयों के उपयोग के संबंध में ऐसे अनुदेर् भी जारी कर
सकेगा, जैसा कक िह उथचि समझे :
परन्िु एक िाि से अथधक संव्यिहार करने िािी सोसायटी के िेिे चाटाडा एकाउंटेंट दिारा सम्यक
रूपेि संपरीक्षक्षि रूप में रजजस्रार को प्रस्िुि ककए जाएंगे।
(2) यदद रजजस्रार विर्ेष संपरीक्षा करना आियर्क समझे, िह ककसी भी सोसायटी के िेिाओं की
संपरीक्षा स्ियं कर सके गा या उसके दिारा इस संबंध में लिखिि संधारि या विर्ेष आदेर् दिारा
प्राथधकृि ककये गये ककसी भी व्यजति से करिा सकेगा।
(3) रजजस्रार दिारा लिखिि साधारि या विर्ेष आदेर् दिारा इस संबंध में प्राथधकृि ककये गये
ककसी भी व्यजति की, सोसायटी की समस्ि िेिा पुस्िकों ििा अन्य कागज पत्रों िक समस्ि समयों पर
पहुंच होगी और सोसायटी का प्रत्येक अथधकारी सोसायटी के िेिाओं ििा उसके कायाकरि के बारे में
ऐसी जानकारी देगा, जो कक ऐसा तनरीक्षि करने िािा व्यजति अपेक्षक्षि करे।
हटप्पिी (िािा 28)
धारा 32 के अधीन ररपोटा पर आधाररि कारि बििाओं सूचना प्रदि, कफर भी प्राकृतिक न्याय के
लसदधांिों को अपनाया जाना चादहये। प्राकृतिक न्याय के लसदधांि के अनुसार यह अपेक्षक्षि है, ररपोटा की
प्रतिलिवप पीड़ड़ि तनकाय को प्रदान की जाए। तछपाने का काया न्यातयक कपप स्िभाि का है , और एक
प्रर्ार्तनक र्जति नहीं है। राजबहादुर पाठक वि. म.प्र. राज्य, ए.आई.आर. 1985 एम.पी. 238 = 1985
एम.पी.एि.जे. 549 = 1985 जे.एि.जे. 563
29. दस्िािेजों का तनरीक्षि - कोई भी व्यजति, इस अथधतनयम के अधीन रजजस्रार के पास फाइि ककये
गये समस्ि दस्िािेजों या उनमें से ककसी भी दस्िािेज का तनरीक्षि कर सकेगा , या ऐसी फीस जैसी कक
विदहि की जाए, के साि आिेदन फाईि करके ऐसे कक सी भी दस्िािेज की प्रतिलिवप या उसका उदधरि
जो रजजस्रार दिारा प्रमाखिि ककया जायेगा , की अपेक्षा कर सकेगा और ऐसी प्रमाखिि प्रतिलिवप उसमें
अंिविालर्ि बािों के संबंध में चाहे िे ककसी भी प्रकार की हों, समस्ि विथधक कायािादहयों में प्रिम दष्टया
साक्ष्य होंगी।
30. हाजजर कराने की र्जतियााँ - उन्हीं साधनों दिारा यिासंभि उसी रीति में , जो कक लसविि प्रकक्रया
संदहिा, 1908 (क्रमांक 5 सन् 1908) दिारा लसविि न्यायािय के मामिे में उपबजन्धि हो/हैं, साक्षक्षयों को
जजनके अंिगाि दहिबदध पक्षकार आिे हैं , या उनमें से कोई भी आिा हैं, समन करने ििा उन्हें हाजजर
कराने और उन्हें साक्ष्य देने के लिये विर्ेष करने ििा दस्िािेज पेर् करने के लिये वििर् करने की
रजजस्रार को र्जति होगी।
31. जानकारी मंगाने की रजजस्रार की र्जति - (1) जहॉ कक ककसी ऐसे दस्िािेज का, जजसका कक ककसी
सोसायटी दिारा इस अथधतनयम के अधीन रजजस्रार को प्रस्िुि ककया जाना अपेक्षक्षि है, पररर्ालिन करने
पर रजजस्रार की राय हो , कक कोई जानकारी या स्पष्टीकरि इसलिए आिश्यक है, कक जजससे ऐसी
दस्िािेज उस विषय की, जजससे कक उसका संबंथधि होना िात्पतयाि है , पूिा विलर्जष्टयााँ दे सके, िो िह
दस्िािेज प्रस्िुि करने िािी सोसायटी से लिखिि आदेर् दिारा, यह अपेक्षा कर सकेगा कक िह ऐसी
जानकारी या स्पष्टीकरि ऐसे समय के भीिर जजसे कक िह उस आदेर् में विनेददार्ि करे, लिखिि में दे।
(2) सोसायटी को उपधारा (1) के अधीन आदेर् प्राति हो जाने पर, सोसायटी का ििा समस्ि ऐसे
व्यजतियों का, जो कक सोसायटी के अथधकारी हैं, यह किाब्य होगा कक िे अपनी र्जति भर ऐसी जानकारी
या स्पष्टीकरि दें।
अध्याय - 7
िॉच तथा अनतगिन
32. जॉच ििा वििादों का तनपटारा - (1) रजजस्रार स्िप्रेरिा से, या उपधारा (2) के अधीन ककये गये
आिेदन पर या िो स्ियं या ककसी ऐसे व्यजति दिारा , जजसे कक उसने लिखिि आदेर् दिारा प्राथधकृि
ककया हो, ककसी सोसायटी के गठन, कायाकरि ििा वििीय जस्िति की जांच कर सकेगा।
(2) उपधारा (1) में तनददाष्ट ककये गये प्रकार की जॉच -
(क) सोसायटी के र्ासी -तनकाय के सदस्यों में से अथधकांर् सदस्यों के आिेदन पर से उसकी
अन्ििास्िु के समिान में एक द्रापिपत्र के साि की जायेगी, या
(ि) सोसायटी की कुि सदस्य संिया के कम से कम एक तिहाई सदस्यों के आिेदन पर से की
जायेगी।
(3) रजजस्रार या उपधारा (1) के अधीन उसके दिारा प्राथधकृि ककये गये व्यजति को इस धारा
के अधीन जॉच के प्रयोजन के लिए तनम्नलिखिि र्जतियााँ होगी, अिााि् -
(क) सोसायटी की या उसकी अलभरक्षा में की पुस्िकों, िेिाओं, दस्िािेजों, प्रतिभूतियों, नगदी
ििा अन्य सम्पवियों िक उसकी अबाध पहुंच समस्ि समयों पर रहेगी और ककसी भी ऐसे
व्यजति को , जो ककन्हीं भी ऐसी पुस्िकों, िेिाओं, दस्िािेजों, प्रतिभूतियों, नगदी या
सम्पवियों का कब्जा रििा हो या उनकी अलभरक्षा के लिये उिरदायी हों , उति पुस्िकें,
िेिें, दस्िािेजों, प्रतिभूतियां, नगदी या अन्य सम्पवियां , यदद िे सोसायटी के प्रधान
कायाािय से संबंथधि हो, िो उसके मुख्यािय पर ककसी भी स्िान पर ििा यदद सोसायटी
की ककसी र्ािा से संबंथधि हो िो उस नगर के , जजसमें ककसी उसकी र्ािा जस्िि हो,
ककसी स्िान पर या अपने स्ियं के कायाािय में पेर् करने के लिये समन कर सकेगा,
(ि) िह ककसी भी ऐसे व्यजति को , जजसके कक संबंध में उसके पास यह विश्िास करने का कारि
हो, कक उसे सोसायटी के कायाकिापों में से ककसी भी कायाकिाप की जानकारी है,
सोसायटी के मुख्यािय पर के ककसी भी स्िान पर या उसकी ककसी र्ािा में या
अपने स्ियं के कायाािय में अपने समक्ष उपसंजाि होने के लिये समन कर सकेगा ,
और
(ग) (एक) िह, सोसायटी के साधारि सजम्मिन के लिये सूचना की कािािथध वितनददावषि
करने िािे ककसी वितनयम या उपविथध के होिे हुये भी, सोसायटी के अथधकाररयों से
यह अपेक्षा कर सकेगा कक िे सोसायटी के प्रधान कायाािय पर या सोसायटी के
मुख्यािय पर के ककसी अन्य स्िान पर ऐसे समय पर जैसा कक उसके दिारा
तनदेलर्ि ककया जाये, सोसायटी का साधारि सजम्मिन बुिािे ििा ऐसे मामिों का
जजनका कक संबंध में उसके दिारा तनदेलर्ि ककया जाये, अिधारि करें और जहॉ
सोसायटी के अथधकारी ऐसा सजम्मिन से इंकार करे या बुिाने से चूक जाये िहॉ
उसे िह सजम्मिन स्ियं बुिाने की र्जति होगी।
(दो) उपिंड (1) के अधीन बुिाये गये ककसी सजम्मिन को सोसायटी के वितनयमों या
उपविथधयों के अधीन बुिाये गये साधारि सजम्मिन की समस्ि र्जतियााँ होंगी ििा उसकी कायािादहयां
ऐसी उपविथधयों दिारा वितनयलमि होंगी।
(4) जब इस धारा के अधीन कोई जांच की जाये, िो रजजस्रार जांच का पररिाम सोसायटी को
संसूथचि करेगा, और सोसायटी को समुथचि तनदेर् जारी कर सकेगा, जो समस्ि संबंथधि पक्षकारों पर
आबदधकर होंगे।
हटप्पिी (िािा 32)
धारा 32 के अधीन ररपोटा पर आधाररि कारि बििाओं सूचना प्रदि, कफर भी प्राकृतिक न्याय के
लसदधांिों को अपनाया जाना चादहए। प्राकृतिक न्याय के लसदधांि के अनुसार यह अपेक्षक्षि है, कक ररपोटा
की प्रतिलिवप पीड़ड़ि तनकाय को प्रदान की जाए। तछपाने का काया न्यातयक कपप स्िभाि का है, और एक
प्रर्ासतनक सर्ति नहीं है। राजबहादुर पाठक वि. म.प्र. राज्य, ए.आई.आर. 1985 एम.पी. 238=1985
एम.पी.एि.जे. 549=1985 जे.एि.जे. 563
धारा 32 के अधीन उपचार प्रदि। व्यिहार अन्िदहाि रूप से तनदगोथधि है। केर्ि चौबे वि. सिोदय
सलमति, 1989 (1) म.प्र.िी.नो. 14
पंजीयक की द्राजति - सहायिा रदहि विदयािय के तनयोजक एिं कमाचारी के संबंध का पयािेक्षि
करने के लिए प्रयोग नहीं कर सकिा है। र्ोभना (श्रीमिी) वि. कािीदास मान्टेसरी स्कूि, उज्जैन
1991(11) म.प्र.िी.नो. 106
पंजीयक की र्जति - िह तनिााथचि तनकाय के स्िान में िदिा सलमति की तनयुजति नहीं कर
सकिा है। िह र्ासी -तनकाय का अतििंघन करने में अक्षम है। चम्बि घाटी लर्क्षा प्रसार सलमति वि.
मध्यप्रदेर् राज्य, 1995 एम.पी.एि.जे. 969=1996 आर.एन. 46
तनिााथचि तनकाय, सुनिाई का अिसर प्रदि ककये बबना, अतििंघन नहीं ककया जा सकिा है।
चम्बि घाटी लर्क्षा प्रसार सलमति वि. मध्यप्रदेर् राज्य, 1996 आर.एन. 46 = 1999 (5) एम.पी.एि.जे.
969
पंजीयक की जांच धारा 32 के अधीन चाही गई के अनुसार नहीं है। प्रर्ार्क को आक्षेप
विचारािा प्रदि। विचार के अनुरूप आक्षेप तनिीि। ऐसे आदेर् के विरूदध राज्य र्ासन के समक्ष
पुनरािेदन होना है। कुसुम बाई जैन वि. मध्यप्रदेर् राज्य 1998 (2) जे.एि.जे. 397
धारा 32 के अधीन क्षेत्राथधकार का उपयोग करिे हुये पंजीयक सदस्य के िैधातनकिा के संबंध
में जांच पड़िाि कराने हेिु प्राथधकारी है। एस.सी.श्रीिास्िि एिं अन्य वि. मध्यप्रदेर् राज्य एिं अन्य
2002 (2) एम.पी.एि.जे. 607
धारा 32 के अधीन जांच , केिि र्ासी -तनकाय के दिारा आिेदन पत्र एिं र्पि पत्र प्रस्िुि
करने पर िदनुसार होगा (श्रमधाम उच्चिर माध्यलमक विदयािय संचािन सलमति एिं अन्य वि.
मध्यप्रदेर् राज्य एिं अन्य 2003(2) एम.पी.एि.जे. 377)
ककस आदेर् या कायािाही के क्षेत्राथधकार से पूिािः परे होने की विर्ेष जस्िति में याथचका का
प्रस्िुतिकरि प्रतििांतछि नहीं ककया जा सकिा, ििा िैकजपपक उपचार का प्रािधान होने (धारा 32)
के आधार पर िाद तनरस्ि नहींककया जा सकिा। छ.ग. स्टेट िाइतिांडो एसोलसएर्न, बबिासपुर एिं
अन्य वि. िाइतिांडो फ े डरेर्न ऑफ इंड़डया एिं अन्य, छ.ग. उच्च न्यायािय ररट वपटीर्न (सी) क्र.
2976 सन् 2011, तनिीि ददनांक 23-2-2012
33. र्ासी तनकाय का अतिदगठान - (1) यदद राज्य सरकार की राय में ककसी राज्य सहायिा प्राति
सोसायटी का र्ाषी तनकाय -
(क) उन किाव्यो का, जो कक इस अथधतनयम दिारा उसके अधीन या सोसायटी के वितनयमों या
उसकी उपविथधयों दिारा या उनके अधीन या राज्य सरकार या रजजस्रार दिारा पाररि ककये
गये ककसी विथधपूिा आदेर् दिारा उस पर अथधरोवपि ककये गये है, पािन करने में बार-बार
व्यतिक्रम करिा है या उनका पािन करने में उपेक्षा करिा है या ऐसे किाव्यो का पािन
करने के लिए रजामंद नहीं है या
(ि) ऐसे काया करिा है जो सोसायटी के या उसके सदस्यों के दहि पर प्रतिकूि प्रभाि डाििा
है, या
(ग) अन्यिा उथचि रूप से काया नहीं कर रहा है,
िो राज्य सरकार लिखिि आदेर् दिारा उस र्ासी तनकाय को हटा सकेगी ििा सोसायटी के काम
काज का प्रबंध करने के लिये ककसी व्यजति या ककन्हीं व्यजतियों को ककसी वितनददाष्ट कािािथध
के लिये जो प्रिमिः दो िषा से अथधक नहीं होगी, तनयुजति कर सकेगी :
परन्िु जहॉ सोसायटी के र्ासी तनकाय को केिि इस आधार पर हटाना प्रस्िाविि हो , कक र्ासी
तनकाय के अनुसार नहीं कराया गया िा, िहॉ इस उपधारा के अधीन कोई भी कायािाही िब िक
नहीं की जायेगी, जब िक कक रजजस्रार या उसके दिारा इस संबंध में प्राथधकृि ककये गये ककसी
अथधकारी ने इस अथधतनयम या उसके अधीन बनाये गये वितनयम या उपविथधयों के अनुसार
उसके (र्ासी -तनकाय) लिये तनिााचन कराने हेिु साधारि तनकाय का सजम्मिन न बुिाया हो,
और िह निीन र्ासी तनकाय को तनिााथचि करा िेने में असफि न रहा हो :
परन्िु यह और भी रजजस्रार या उसके दिारा प्राथधकृि ककये गये अथधकारी को तनिााचन कराने के
प्रयोजन के लिये, इस अथधतनयम या उसके अधीन बनाये गये वितनयमों या उपविथधयों के अधीन समस्ि
आियर्क र्जतियााँ होगी।
(2) उपधारा (1) के अधीन कोई भी आदेर् िब िक नहीं ददया जायेगा जब िक कक प्रस्िाविि
आदेदगा के विरूदध कारि दर्ााने का युजतियुति अिसर र्ासी -तनकाय को न ददया गया हो, और उसके
दिारा आिेदन ककया जाने की दर्ा में उस आिेदन पर विचार न कर लिया गया हो।
(3) उपधारा ( 1) के अधीन आदेर् में वितनददाष्ट की गयी कािािथध राज्य सरकार के
वििेकानुसार समय-समय पर बढ़ाई जा सकेगी :
परन्िु ऐसा कोई भी आदेर् कुि लमिाकर िीन िषा से अथधक कािािथध के लिये प्रिृि नहीं रहेगा।
(4) इस प्रकार तनयुति ककये गये व्यजति या व्यजतियों को, रजजस्रार के तनयंत्रि के ििा
अनुदेर् के जो कक िह समय-समय पर दे, अध्यधीन रहिे हुए, र्ाश्कीय तनकाय के या सोसायटी के ककसी
अथधकारी के समस्ि कृत्य या उनमें से कोई भी कृत्य करने की और ऐसी समस्ि कायािादहयां जो कक
सोसायटी के दहि में अपेक्षक्षि हो करने की र्जति होगी।
(5) राज्य सरकार इस प्रकार तनयुति ककये गये व्यजति या व्यजतियों को पाररश्रलमक तनयि
कर सकेगी, ऐसे पाररश्रलमक की रकम ििा अन्य िचे यदद कोई हो जो सोसायटी के प्रबंध में ककये गये
हो उसकी (सोसायटी की) तनथधयों में से देय होंगे।
(6) इस प्रकार तनयुति ककया गया व्यजति या तनयुति ककये गये व्यजति उसकी या उनकी
तनयुजति का कािािथध का अिसान होने पर सोसायटी के वितनयमों के अनुसार निीन र्ासी तनकाय का
गठन करने के लिए व्यिस्िा करेगा/करेंगे।
(7) यदद ककसी बाि के बारे में सोसायटी के साधारि तनकाय ििा उपधारा ( 1) के अधीन
तनयुति ककये गये व्यजति या व्यजतियों के बीच मिभेद हो , िो िह रजजस्रार को वितनलर्ि के लिये
तनदेलर्ि ककया जायेगा और उस पर उसका वितनलर्ि अंतिम होगा।
(8) सूचना के जारी ककये जाने ििा र्ासी तनकाय को हटाने संबंधी आदेर् पाररि ककये जाने के
बीच की कािािथध के दौरान, र्ासी तनकाय से राज्य सरकार दिारा यह अपेक्षा की जा सकेगी कक िह
(र्ासी -तनकाय) ऐसे प्राथधकारी के जजसे ककस सरकार इस संबंध में वितनददाष्ट करे, पयािेक्षि के अधीन
ििा उसके अनुमोदन से कृत्य करें और र्ासी तनकाय दिारा ददया गया कोई आदेर् या पाररि ककया गया
कोई संकपप या ददया गया कोई अन्य काया िब िक प्रभािी नहीं होगा, जब िक कक िह ऐसे वितनददाष्ट
ककये गये प्राथधकारी दिारा अनुमोददि न कर ददया गया हो।
हटप्पिी (िािा 33)
छ0ग0 सोसायटी रजजस्रीकरि अथधतनयम , 1973 धारा 33(4) - सोसायटी का साधारि
सजम्मिन ददनांक 15-5-2006 को सम्पन्न होने के बाद किेतटर रायपुर को प्रर्ार्क तनयुति ककया
गया। राज्य के प्राथधकाररयों ने साधारि सजम्मिन के पश्चाि् बनाए गये नये सदस्यों के आधार पर
चुनाि कराने का प्रयास ककया, जजस पर अपीिािी दिारा प्रस्िुि याथचका में उच्च न्यायािय (एकि
न्यायधीर्) ने ददनांक 4-12-2010 को अपीिािी दिारा उथचि फोरम में जाने की सुविधा सुरक्षक्षि रििे
हुए आदेर् पाररि ककया गया , अिः यह अपीि। अलभतनधााररि - पूिा आदेर् ददनांक 4-12-2010 को
स्पदगट करिे तनदेलर्ि ककया कक पंजीयक/प्रर्ार्क दिारा उन सदस्यों की सूची के अनुसार ही मिदान
कराया जािे जो साधारि सजम्मलिन की तिथि 15-5-2006 का पंजीकृि िे, और तनिााचन आदेर् प्राति
होने की तिथि से 6 सतिाह की समय-सीमा में सुतनजश्चि ककया जािे। बाि आश्रम वि. छ.ग. राज्य एिं
अन्य ररट वपटीर्न नं. 560 सन् 2010 डी.बी. छ.ग.
राज्य से िाभ प्राति सोसायटी - याथचकाकिाा की प्रर्ार्ाकीय तनकाय को अतिदथगठि करना
प्रस्िाविि करिे हुए र्ासन दिारा धारा 33 के अंिगाि जारी नोदटस को इस आधार पर चुनौिी दी गई है
कक नोदटस विथध के अथधकार के बबना है, याथचकाकिाा सोसाइटी र्ासन से िाभ प्राति सोसाइटी नहीं है -
राज्य र्ासन के दिारा यह किन ककया गया कक याथचकाकिाा सोसाइटी ने राज्य सरकार से जमीन प्राति
ककया है इसलिए ''राज्य से िाभ प्राति सोसाइटी '' की पररभाषा की पूतिा होिी है एिं पट टा वििेि की
प्रतिलिवप पेर् ककया। अलभतनधााररि - याथचकाकिाा सोसाइटी ने राज्य र्ासन से ररयायिी दर से जमीन
प्राति ककया है इसलिये उसके कामकाज के प्रबंध को विथधक हस्िक्षेप से वितनयलमि ककये जाने के लिये
अथधतनयम की धारा 33 के अंिगाि बाध्य है। बाि आश्रम वि.छ.ग. राज्य एिं अन्य , 2006 (1) छ.ग.
िॉ.ज. 468
सोसायटी की उपविथधयां, यह स्पष्ट रूपेि दजष्ट करिी है, कक कोई सदस्य िब िक अपने पद
को धारि करेगा , जब िक समुथचि रूप से तनिााथचि तनकाय प्रभार को द्गहि नहीं कर िेिी है।
अतिदथगठि र्ासी -तनकाय पुनस्िापन के बाद युजतिसंगि समय के अंदर चुनाि को अलभतनधााररि
करना चादहए। र्ासन की राय, ऐसी राय पर आधाररि तनिा य कारिोंके साि प्रदान ककया जाना चादहये।
राजबहादुर पाठक वि. मध्यप्रदेर् राज्य ए.आई.आर. 1985 एम.पी. 238= 1985 जे.एि. जे 563= 1985
एम.पी.एि.जे. 549
पंजीयक की र्जति - िह तनिााथचि तनकाय के स्िान में िदिा सलमति की तनयुजति नहीं कर सकिा है।
िह र्ासी तनकाय का अतििंघन करने में अक्षम है। चंबि घाटी प्रसार सलमति वि. मध्यप्रदेर् राज्य,
1995 एम.पी.एि.जे. 969=1996 आर.एन. 46
सोसायटी का अथधक्रमि , इसके प्रििान की अिथध केिि िीन िषा की है। इस समयािथध के
पश्चाि् प्रबध प्रबंधकारी सलमति में तनदहि हो जािी हैं जी. ई.एफ. कमाचारी यूतनयन स्कूि मैनेजजंग बॉडी
वि. मध्यप्रदेर् राज्य 1993 (2) विथध भास्िर 272
धारा 33 (1) के अधीन प्रर्ासक की तनयुजति उन्हें चयाा संबंधी काया करने हेिु एिं दैतनक
प्रबंध को देिने के लिए र्जतियााँ प्रदि। प्रर्ार्क अतितिदगठ/सोसायटी में सदस्यों की तनयुजति एिं
सदस्यिा का आमंत्रिािा प्रकार्न नहीं कर सकिा है। कुसुम बाई जैन वि. मदयप्रदेर् राज्य 1998(2)
जे.एि.जे. 397
यदयवप प्रर्ासक के पास र्ासी तनकाय की सम्पूिा र्जतियााँ है, परन्िु िह निीन सदस्य का
नाम नहीं लिि सकिा है। सोसायटी की अतितिदगठ ति थि पर उपिब्ध सदस्यों की संख्या के अनुसार
तनिााचन ककया जाना है। 1997(6) एस.सी.सी. 37=ए.आई.आर. 1997 सन्या 2925 (अनुसररि)। सुजीि
कुमार बनजी वि. मध्यप्रदेर् राज्य ए.आई.आर. 2000 एम.पी. 44
राज्य र्ार्न से 1990-91 में याची/सोसायटी को केिि 50,000/- रूपये की सहायिा दी गयी
िी। याची/सोसायटी राज्य र्ासन से कोई सहायिा प्राति नहीं कर रहा है। अिः जस्िति को देििे हुए, िह
राज्य सहायिा प्रदि सोसायटी नहीं है। धारा 33 के अधीन पाररि ददनांककि 21-6-2000 आदेलर्का को
रद द ककया जािा है। 1982 एम.पी.एि.जे. 762 (अनुसररि)। छिरपुर होलमयोपैथिक एिं बायोकेलमक
अस्सोलसअर्न वि. मध्यप्रदेर् राज्य एिं अन्य 2001(3) एम.पी.एि.जे. 405
र्ासी तनकाय के अथधक्रमि हेिु पंजीयक की र्जति नहीं है। यह र्जति र्ासन में तनदहि है।
श्रमधाम उच्चिर माध्यलमक विदयािय संचािन सलमति एिं अन्य वि. मध्यप्रदेर् राज्य एिं अन्य
2003 (2) एम.पी.एि.जे. 377
अध्याय - 8
सोसायहटयों का ववघटन
34. सोसायदटयों के विघटन और उनके कायाकिापों के समायोजन के लिये उपबंध - (1) ककसी भी
सोसायटी के उिने सदस्य, जो उसके सदस्यों के िीन-पंचमार् से कम न हो , यह अिधाररि कर सक ें गे
कक उसका विघटन कर ददया जाये , और िदुपरर ि ित्काि या उस समय, जबकक सहमति हो जाये ,
विघदटि कर दी जायेगी ििा सोसायटी की सम्पवि उसके दािों एिं दातयत्िों के तनपटारे ििा पररतनधाारि
के लिये उति सोसायटी को िागू होने िािे उसके वितनयमों, यदद कोई हो के अनुसार और यदद वितनयम
न हो िोजैसा कक र्ासी तनकाय समीचीन समझे, समस्ि अिायश्यक कायािाही जी जायेगी।
परन्िु सोसायटी के उति र्ाषी तनकाय या सदस्यों के बीच कोई वििाद उत्पन्न होने की दर्ा
में, उसके कायाकिापों का समायोजन, उस जजिे क, जजसमें सोसायटी का मुिय भिन जस्िि हो, आरंलभक
लसविि अथधकाररिा िािे प्रधान न्यायािय को तनदेलर्ि ककया जायेगा, और न्यायािय उस मामिे में ऐसा
आदेर् करेगा जो कक िह उथचि समझे :
परन्िु िह और भी कक कोई भी सोसाइटी िब िक विघदटि नहीं की जायेगी , जब िक कक इस
प्रयोजन के लिये बुिाये गये साधारि सम्मेिन में उसके सदस्यों के िीन -पंचमार् सदस्यों ने स्ियं
या परोक्षी दिारा मि देकर, ऐसे विघटन के लिये इच्छा अलभव्यति न कर दी हो :
परन्िु यह भी कक जब कभी सरकार, ककसी सोसायटी का सदस्य हो या उसका अंर्दािा हो या उसमें
अन्यिा दहिबदध हो, िो ऐसी सोसायटी सरकार की सम्मति के बबना विघदटि नहीं की जायेगी।
(2) यदद रजजस्रार की , उसे जानकारी प्राति होने पर या अन्यिा , यह राय हो कक सोसायटी
तनदथगक्रय हो गयी है , या इस अथधतनयम या उसके अधीन बनाये गये वितनयमों का उपविथधयों के
उपबंधों का पािन करने में बार-बार व्यतिक्रम करिी रही है, िो िह (रजजस्रार) सोसायटी पर सूचना की
िामीि करके, सूचना में वितनददाष्ट की गई कािािथध , जो िीस ददन से कम नहीं होगी , भीिर र्ासी
तनकाय से यह कारि दर्ााने की अपेक्षा कर सकेगा , कक तयों न सोसायटी का रजजस्रीकरि रद द कर
ददया जाए।
(3) रजजस्रार, प्राति हुये उिर, यदद कोई हो, पर विचार करने के पश्चाि् सूचना की कािािथध
का अिसान हो जाने के पश्चाि् उसका यह समाधान हो जाने पर की सोसायटी के चािू रहने में ककसी
उपयोगी प्रयोजन की पूतिा होना संभाव्य नहीं है, िो िह, लिखिि आदेर् दिारा आदेर् में वितनददाष्ट की
गयी िारीि से उस सोसायटी का रजजस्रकरि रद द कर सकेगा , और उस आधार पर सोसायटी इस
अथधतनयम के प्रयोजनों के लिये विघदटि हुई समझी जायेगी।
35. विघटन होने पर ककसी भी सदस्य को िाभ प्राति नहीं होगा - यदद ककसी सोसायटी का विघटन हो
जाने पर उसके समस्ि गिों ििा दातयत्िों का चुकाया ककया जाने के पश्चाि् कुछ भी सम्पवि बाकी
बच जाये, िो उस सम्पवि का उति सोसायटी के सदस्यों को या उनमें से कक सी भी सदस्य को
संदाय नहीं ककया जायेगा , या िह उनमें वििररि नहीं की जायेगी अवपिु िह ककसी अन्य ऐसी
सोसायटी को दी जायेगी जजसका कक अिधारि विघटन के समय व्यजति या परोक्षी दिारा उपजस्िि
सदस्यों के कम से कम िीन पंचमार् सदस्यों के मिों दिारा या ऐसा न होने की दर्ा में, धारा 34
में वितनददाष्ट न्यायािय दिारा ददया जायेगा :
परन्िु यह धारा ऐसी सोसायटी को िागू नहीं होगी जो अंर्धाररयो के अलभदायों दिारा जॉइन्ट स्टॉक
कम्पनी के रूप में प्रारंभ की गई या स्िावपि की गई हो।
36. (1) विघटन के पश्चाि् इस बाि का अिधारिा कक सम्पवि का उपयोग सरकार दिारा ककया
जायेगा - धारा 35 मExcerpt shown. Open the full act in Lexace.
Lex